नज़र बदल के

​कभी अपने ही शहर को

अजनबी निगाह से देखो

कभी उन रोज़ाना राहों पे

चलते चलते यूं ही ठिठको

वो गलियां जो दूर से देखीं

उनके दरवाज़ों और खिड़कियों को

अपनी हैरत भरी आँखों के 

ताज़ा सलाम तो भेजो

कभी अपने शहर को

एक अजनबी निगाह से देखो

बिजली के खम्बों से

लिपटती तारों पे बैठे

परिंदों से कभी रुबरु हो जाओ,

उस रमता जोगी कौवे से

मेहमानों के हाल तो पूछो

कभी अपने शहर को 

अजनबी निगाह से देखो।

-परबिनवा

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एक टिप्पणी

  1. Sharmishtha · सितम्बर 10

    cant do that, but it will be fun!

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