Raahein

​राहों के मुसाफिर कब हुए अपने

रिश्ते तो सभी मंज़िल के हैं,

न राहें करतीं शिकवा कभी

वीराने के भी अपने मज़े हैं।
फिर जाएगा कोई इस राह से, ये

न उम्मीद से है, नाउम्मीद नहीं है।

राहों के फलसफे सीधे साधे, 

हैं भले टेढ़ी मेढ़ी संकरी चौड़ी,

राहें हैं, बस आने जाने की।
-परबिनवा

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