Proff aur uske baad :)

image

बड़े दिनों तक रूठी निंदिया, हमसे रही नाराज़,
बड़े दिनों तक निशा-दिवा का हुआ नहीं आभास,
बड़े दिनों तक काले अक्षर, रटते रहे नि:श्वास,

बड़े दिनों तक तकिया भूली, पोथे रहे सिरहाने
बड़े दिनों तक अगली बारी सुधरने की हम ठाने
बड़े दिनों तक पछताए सब अपने पाप पुराने।

याद नहीं है! नो सर! सॉरी सर! कह के काम चलाया
भूल टशन्न में, भीगी बिल्ली वाला चेहरा बनाया
आँख मींच के जीभ काट के मुंह अपना छिपाया।

खुली हवा में सांस मिली है, बड़े दिनों के बाद
बिस्तर से फिर निभाई यारी, बड़े दिनों के बाद
खुले आम फिर की मक्कारी बड़े दिनों के बाद।

कविता की शैली जनकवि ‘बाबा नागार्जुन’ की कविता ‘अकाल और उसके बाद’ से प्रेरित. 🙂

Advertisements

एक टिप्पणी

  1. PARBINVA · अप्रैल 29, 2014

    अकाल और उसके बाद / नागार्जुन

    रचनाकार: नागार्जुन
    http://kavitakosh.org/kk/अकाल_और_उसके_बाद_/_नागार्जुन

    कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
    कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
    कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
    कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

    दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
    धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
    चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
    कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

    रचनाकाल : 1952

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s