नज़र बदल के

​कभी अपने ही शहर को

अजनबी निगाह से देखो

कभी उन रोज़ाना राहों पे

चलते चलते यूं ही ठिठको

वो गलियां जो दूर से देखीं

उनके दरवाज़ों और खिड़कियों को

अपनी हैरत भरी आँखों के 

ताज़ा सलाम तो भेजो

कभी अपने शहर को

एक अजनबी निगाह से देखो

बिजली के खम्बों से

लिपटती तारों पे बैठे

परिंदों से कभी रुबरु हो जाओ,

उस रमता जोगी कौवे से

मेहमानों के हाल तो पूछो

कभी अपने शहर को 

अजनबी निगाह से देखो।

-परबिनवा

More on love

​Love is an exothermic reaction

It’s a game that nobody plays fair

You want to find an authority

Just to realise it’s not there.
Semantics make you crazy

Lies, lies and lies are all you weave

Some day you give up

And eventually leave.
-Parbinva

Nirala nagar ka nirala aakash

आकाश कुछ अलग नील, 

क्षितिज पे मिलती प्रकाश-अंधकार की बेलें,

बादलों के चकत्ते से सजा हुआ,

बिजली की तारों से कटा सामानांतर,

समय धार में संजोया, अद्वितीय एक पल।

#worldphotoday

कहाँ

चिंतन, मनन, बहुधा आत्मावलोकन

कहीं रुके, फिर चल पड़ता मन

प्रत्यक्ष में अप्रत्यक्ष क्या ढूंढें प्रमाण

अंत कहाँ, हर पल बीते वर्तमान

बनता भूत।

समय भंवर में डूबे, डूबे कभी उतराये

ले श्वांस, डुबकी फिर लगाये

हो छुब्ध कभी, कभी पछताये

न रुके समय की धार, न हों स्थिर फिर विचार

और कभी अनभिज्ञ हो जाए।

सब ही कुछ, कुछ हो जाता-कुछ पलों के लिए

सब ही कुछ, कुछ भी न होता फिर।

द्वंद्व ले चले, और कहीं जाने भी न दे,

हर एक कदम आगे, फिर पीछे दो,

पहुंचेगा कहाँ।

-परबिनवा